यह आत्म परिवर्तन योग शृंखला में पाँचवा अनुच्छेद है।
निस्तब्धता की साधना
मानसिक परिवर्तन
इस पोस्ट में आत्म परिवर्तन का एक मुख्य अभ्यास
प्रस्तुत है।
आत्म परिवर्तन की राह पर पहला अभ्यास मौन रहने की कला है। यह आवश्यक नहीं कि इसी अभ्यास से आप आत्म परिवर्तन प्रारंभ करें, इस विषय का केवल मैं सब से पहले विस्तृत वर्णन कर रहा हूँ। निस्तब्धता मन की शांति की प्राप्ति में आप की सहायता कर सकता है। निस्तब्धता को संस्कृत में मौन कहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि भगवद गीता में मौन को तपस्या के रूप में परिभाषित किया गया है:
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ (भगवद गीता १७- १६)
सुखद स्वभाव, सम मनोदशा, आत्म विचार और निदिध्यासन, एक शांत मन एवं भाव की शुद्धता मन की तपस्या होती है।
मनुष्य का मन सदैव बात करता रहता है। यदि आप बात कर रहे हों तो आपके मन की बात को सुनना संभव नहीं है। यदि आप अपने मन की बातों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो उस को शांत करना असंभव है। और, अपने मन की सुनने के लिए आप का मौन होना आवश्यक है। मन की पूर्ण शांति प्राप्त करने के लिए निस्तब्धता सर्वोपरि है।
पहले आप को छोटी सी अवधि से मौन का अभ्यास प्रारंभ करना चाहिए। कम से कम एक साथ चौबीस घंटों के लिए मौन रहना चाहिए। आप केवल बोलती बन्द करके मौन रहें तो इस अभ्यास की केवल पचास प्रतिशत पूर्ती होगी। मौन अभ्यास का अर्थ है पूरी तरह से निस्तब्धता। अर्थात किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं करना चाहिए। नीचे दिखाये गए चार्ट को ध्यान से जांचें -
उदाहरण के रूप में अपने वाहन चालक परीक्षा के बारे में सोचें। जब आप वाहन चलाने के लिए परीक्षण के अधिकारी के साथ गाडी में बैठते हैं तो आप को यह स्पष्ट है कि कईं गलतियाँ "तात्कालिक विफलता" होती हैं जबकि कुछ गलतियों को क्षमा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि आप मुढ़ते समय इशारा नहीं करते हैं या लेन बदलने से पहले अंध क्षेट्र को देखने में विफल रहें तो आप का परीक्षण तुरन्त समाप्त किया जाता है और आप को वापस जाने को कहा जाता है। किंतु आप यदि पृष्ठ या पीछे देखने वाले दर्पण को लगातार देखने में अधिक सतर्क नहीं रहें और केवल कभी-कभार ही देखते हैं तो आप तब भी सफल हो सकते हैं।
इस प्रकार आगे की सभी प्रथाओं को "तात्कालिक विफलता", "चेतावनी" और "सुधारने की आवश्यकता" के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। उपर्युक्त चार्ट के प्रभाव पंक्ति में “तात्कालिक विफलता” को लाल तथा “चेतावनी” को पीला और “सुधारने कि आवश्यकता” को हरे से सम्बोधित किया गया है।
समझ लें आप अड़तालीस घंटे के लिए मौन रहने का अभ्यास करते हैं। यदि उस अवधि में आप कोई भी मौखिक वार्तालाप करते हैं तो उसका प्रभाव लाल अर्थात विशाल है और उस ही क्षण आप विफल हो जाते हैं। यदि आप उन अड़तालीस घंटों में समाचारपत्र आदि पढ़ें, तो आप के अभ्यास की उत्कृष्टता पाँच प्रतिशत घट जाती है (चार्ट के महत्व पंक्ति को देखें), यह एक "हरी" गलती है क्योंकि आप अपना अभ्यास अभी भी जारी रख सकते हैं।
मौन के समय, शुरू में आप अपने साथ एक पुस्तक ले जा सकते हैं। परंतु आदर्शतः आप को मौन की पूर्ण अवधि एक कमरे में केवल स्वयं की संगत में ही बितानी चाहिए। परंतु यदि आप चौबीस घंटों में अठारह घंटे सोने में बिता दें क्योंकि आप के पास करने के लिए और कुछ नहीं है तब आप मौन के अभ्यास में अपना समय नष्ट ना करें। यह अभ्यास मौन का है, निद्रा का नहीं। आप जितना अधिक सचेत और सतर्क रहें आप का अभ्यास उतना ही बेहतर होगा। जब आप पूर्ण रूप से मौन का पालन करें, आप को अपने मन के बेचैन एवं अशांत स्वभाव का अहसास होना शुरू होगा। आप को पता चलेगा कि मन उस बेचैन लंगूर की तरह है जो अधिक समय तक किसी भी शाखा पर नहीं टिक पाता।
शुरू में, मौन के समय आप के ध्यान करने की क्षमता कम हो जाएगी। साथ ही संभवत: आप एक बेचैनी का अनुभव भी करेंगे। परंतु आप चिंतित ना हों - यह स्वाभाविक है। संयम के साथ निरन्तर प्रयत्न करते रहें फिर धीरे धीरे शांति का अनुभव करेंगे। इस प्रकार आप उत्कृष्टता से ध्यान करने के लिए तैयार हो जाएंगे। मौन अभ्यास एक उपजाऊ भूमी तैयार करने के समान है जिस पर आप ध्यान के बीज बो सकते हैं।
यह जान लें कि जो साधक समाधि की अवस्था का अनुभव करना चाहता हो उस के लिए मौन का अभ्यास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब आप अपने आइपॉड पर अपने मनपसंद गीत सुन रहे हों, तब ऐसा प्रतीत होता है कि बाहरी दुनिया का शोर अपने आप ही थम गया है। वह संगीत अन्य किसी भी ध्वनि को आप के लिए लगभग महत्वहीन एवं अनावश्यक बना देता है। इसी प्रकार जब आप आंतरिक शोर का नियंत्रण एवं संचालन करने में समर्थ हो जाएं, तब वह संगीत में परिवर्तित हो जाता है। और जब आप आंतरिक संगीत को सुनना आरंभ कर दें, तब आप के लिए सांसारिक दुनिया की किसी भी वस्तु का महत्व ही नहीं रह जाता।
मौन के अभ्यास में किसी भी प्रकार का लिखित, मौखिक अथवा इशारों द्वारा संवाद नहीं किया जाता। मौन केवल भाषण का ही नियंत्रण नहीं, इस में अपने कार्यों, भाषण और विचारों को भी शांत किया जाता है। एक सगुन उपासक जो ईश्वर को किसी देवी या देवता के रूप में पूजता है, वह मौन के समय अपने इष्ट की स्तुति कर सकता है। उसके लिए मौन का उद्देश्य मात्र मन की शांति नहीं। मौन द्वारा वह अपने इष्ट देवता के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ बनाता है।
समय आने पर मैं अनाहत नाडा पर अपने व्यक्तिगत अनुभव का वर्णन करूँगा। यह एक ऐसी ध्वनि है जो दो वस्तुओं के टकराने से उतपन्न नहीं होती। अभ्यास से इस ध्वनि तक कोई भी कभी भी पहुँच सकता है। यह निस्तब्धता और एकांत का एक स्वाभाविक परिणाम है।
इस शृंखला के अगले पोस्ट में, मैं मानसिक परिवर्तन के एक मुख्य अभ्यास एकांत पर लिखूँगा।
मौन के महत्व को समझने के लिए आप बातचीत पर लेख (वार्तालाप - एक अनियंत्रित मन की प्रवृति) फिर से पढ़ सकते हैं।
शांति।
स्वामी
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निस्तब्धता की साधना
मानसिक परिवर्तन
इस पोस्ट में आत्म परिवर्तन का एक मुख्य अभ्यास
प्रस्तुत है।
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Image source: Steve Evans |
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ (भगवद गीता १७- १६)
सुखद स्वभाव, सम मनोदशा, आत्म विचार और निदिध्यासन, एक शांत मन एवं भाव की शुद्धता मन की तपस्या होती है।
मनुष्य का मन सदैव बात करता रहता है। यदि आप बात कर रहे हों तो आपके मन की बात को सुनना संभव नहीं है। यदि आप अपने मन की बातों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो उस को शांत करना असंभव है। और, अपने मन की सुनने के लिए आप का मौन होना आवश्यक है। मन की पूर्ण शांति प्राप्त करने के लिए निस्तब्धता सर्वोपरि है।
पहले आप को छोटी सी अवधि से मौन का अभ्यास प्रारंभ करना चाहिए। कम से कम एक साथ चौबीस घंटों के लिए मौन रहना चाहिए। आप केवल बोलती बन्द करके मौन रहें तो इस अभ्यास की केवल पचास प्रतिशत पूर्ती होगी। मौन अभ्यास का अर्थ है पूरी तरह से निस्तब्धता। अर्थात किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं करना चाहिए। नीचे दिखाये गए चार्ट को ध्यान से जांचें -
(बड़ा किया गया चित्र देखने के लिए चार्ट पर क्लिक करें।) |
इस प्रकार आगे की सभी प्रथाओं को "तात्कालिक विफलता", "चेतावनी" और "सुधारने की आवश्यकता" के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। उपर्युक्त चार्ट के प्रभाव पंक्ति में “तात्कालिक विफलता” को लाल तथा “चेतावनी” को पीला और “सुधारने कि आवश्यकता” को हरे से सम्बोधित किया गया है।
समझ लें आप अड़तालीस घंटे के लिए मौन रहने का अभ्यास करते हैं। यदि उस अवधि में आप कोई भी मौखिक वार्तालाप करते हैं तो उसका प्रभाव लाल अर्थात विशाल है और उस ही क्षण आप विफल हो जाते हैं। यदि आप उन अड़तालीस घंटों में समाचारपत्र आदि पढ़ें, तो आप के अभ्यास की उत्कृष्टता पाँच प्रतिशत घट जाती है (चार्ट के महत्व पंक्ति को देखें), यह एक "हरी" गलती है क्योंकि आप अपना अभ्यास अभी भी जारी रख सकते हैं।
मौन के समय, शुरू में आप अपने साथ एक पुस्तक ले जा सकते हैं। परंतु आदर्शतः आप को मौन की पूर्ण अवधि एक कमरे में केवल स्वयं की संगत में ही बितानी चाहिए। परंतु यदि आप चौबीस घंटों में अठारह घंटे सोने में बिता दें क्योंकि आप के पास करने के लिए और कुछ नहीं है तब आप मौन के अभ्यास में अपना समय नष्ट ना करें। यह अभ्यास मौन का है, निद्रा का नहीं। आप जितना अधिक सचेत और सतर्क रहें आप का अभ्यास उतना ही बेहतर होगा। जब आप पूर्ण रूप से मौन का पालन करें, आप को अपने मन के बेचैन एवं अशांत स्वभाव का अहसास होना शुरू होगा। आप को पता चलेगा कि मन उस बेचैन लंगूर की तरह है जो अधिक समय तक किसी भी शाखा पर नहीं टिक पाता।
शुरू में, मौन के समय आप के ध्यान करने की क्षमता कम हो जाएगी। साथ ही संभवत: आप एक बेचैनी का अनुभव भी करेंगे। परंतु आप चिंतित ना हों - यह स्वाभाविक है। संयम के साथ निरन्तर प्रयत्न करते रहें फिर धीरे धीरे शांति का अनुभव करेंगे। इस प्रकार आप उत्कृष्टता से ध्यान करने के लिए तैयार हो जाएंगे। मौन अभ्यास एक उपजाऊ भूमी तैयार करने के समान है जिस पर आप ध्यान के बीज बो सकते हैं।
यह जान लें कि जो साधक समाधि की अवस्था का अनुभव करना चाहता हो उस के लिए मौन का अभ्यास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब आप अपने आइपॉड पर अपने मनपसंद गीत सुन रहे हों, तब ऐसा प्रतीत होता है कि बाहरी दुनिया का शोर अपने आप ही थम गया है। वह संगीत अन्य किसी भी ध्वनि को आप के लिए लगभग महत्वहीन एवं अनावश्यक बना देता है। इसी प्रकार जब आप आंतरिक शोर का नियंत्रण एवं संचालन करने में समर्थ हो जाएं, तब वह संगीत में परिवर्तित हो जाता है। और जब आप आंतरिक संगीत को सुनना आरंभ कर दें, तब आप के लिए सांसारिक दुनिया की किसी भी वस्तु का महत्व ही नहीं रह जाता।
मौन के अभ्यास में किसी भी प्रकार का लिखित, मौखिक अथवा इशारों द्वारा संवाद नहीं किया जाता। मौन केवल भाषण का ही नियंत्रण नहीं, इस में अपने कार्यों, भाषण और विचारों को भी शांत किया जाता है। एक सगुन उपासक जो ईश्वर को किसी देवी या देवता के रूप में पूजता है, वह मौन के समय अपने इष्ट की स्तुति कर सकता है। उसके लिए मौन का उद्देश्य मात्र मन की शांति नहीं। मौन द्वारा वह अपने इष्ट देवता के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ बनाता है।
समय आने पर मैं अनाहत नाडा पर अपने व्यक्तिगत अनुभव का वर्णन करूँगा। यह एक ऐसी ध्वनि है जो दो वस्तुओं के टकराने से उतपन्न नहीं होती। अभ्यास से इस ध्वनि तक कोई भी कभी भी पहुँच सकता है। यह निस्तब्धता और एकांत का एक स्वाभाविक परिणाम है।
इस शृंखला के अगले पोस्ट में, मैं मानसिक परिवर्तन के एक मुख्य अभ्यास एकांत पर लिखूँगा।
मौन के महत्व को समझने के लिए आप बातचीत पर लेख (वार्तालाप - एक अनियंत्रित मन की प्रवृति) फिर से पढ़ सकते हैं।
शांति।
स्वामी
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